Suresh  has contributed to Personal Finance written for The Financial Planners’ Guild India, Mumbai and written on Insurance Coloumn for Dainik Bhaskar and regular contribution in Samadhan Section of Business Bhaskar (See Media Section) where he answers readers’ queries on various personal financial matters.

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सिस्टमेटिक ट्रांसफर प्लान (एसटीपी) क्या होता है और यह कैसे काम करता है। एसटीपी का चयन किन परिस्थितियों में किया जाना चाहिए? – राजन, इंदौर

सिस्टमेटिक ट्रांसफर प्लान यानी एसटीपी एक ही फंड के हाउस के एक स्कीम से दूसरे स्कीम में पैसे ट्रांसफर करने का जरिया है। यह सिस्टमेटिक इन्वेस्टमेंट प्लान (सिप) जैसा ही है लेकिन म्यूचुअल फंडों के सिप में जहां पैसे बैंक खाते से स्कीम में लगाए जाते हैं वहीं सिस्टमेटिक ट्रांसफर प्लान के अंतर्गत एक ही फंड हाउस के एक स्कीम से दूसरे स्कीम में पैसे ट्रांसफर किए जाते हैं।
आम तौर पर एसटीपी लिक्विड फंडों से इक्विटी फंडों में किया जाता है जहां पैसे लिक्विड फंड से एक नियमित अंतराल पर निकल कर इक्विटी फंड में निवेशित होते रहते हैं। जब मुनाफावसूली की जाती है या मार्केट लिंक्ड प्रोडक्ट से निकासी करनी होती है तो पैसे वापस लिक्विड फंड में लाए जाते हैं।

ज्यादातर स्कीम में एसटीपी दैनिक, साप्ताहिक, पाक्षिक या मासिक किया जा सकता है। अगर किसी निवेश को एकमुश्त अधिक पैसों का इक्विटी फंडों में निवेश करना हो तो वह एसटीपी का सहारा ले सकते हैं।

यह यूनिटों का खरीद मूल्य औसत करने का एक अच्छा जरिया है। एकमुश्त निवेश में जोखिम अधिक होता है। एकमुश्त राशि का निवेश लिक्विड फंड में करने के बाद पहले से निर्धारित राशि का नियमित अंतराल पर इक्विटी फंडों में एसटीपी के जरिए निवेश किया जा सकता है।

मैं मासिक सिप के जरिए एचडीएफसी टैक्स सेवर फंड में निवेश कर रहा हूं। हालांकि, मैंने डिविडेंड री-इन्वेस्टमेंट प्लान चुना हुआ है और बाद में मुझे एहसास हुआ कि इस चयन से मेरे पैसे लॉक हो रहे हैं। क्या मैं डिविडेंड री-इन्वेस्टमेंट की जगह ग्रोथ का विकल्प चुन सकता हूं? मैं पिछले पांच साल से इस फंड में निवेश कर रहा हूं। – गोपेश शर्मा, जयपुर

 
गोपेश जी आपकी बात बिल्कुल सही है कि दुबारा निवेश किया जाने वाला डिविडेंड अगले तीन साल के लिए लॉक हो जाएगा। यही वजह है कि हम टैक्स सेवर फंडों के मामले में डिविडेंड री-इन्वेस्टमेंट प्लान की सलाह नहीं देते हैं क्योंकि आप कभी भी अपने पूरे पैसे एक साथ नहीं निकाल सकते हैं भले फंड का प्रदर्शन बुरा क्यों चल रहा हो।
जहां तब डिविडेंड री-इन्वेस्टमेंट की जगह ग्रोथ विकल्प चुनने की बात है तो आप ऐसा कर सकते हैं। टैक्स सेवर फंडों के निवेशकों के लिए ग्रोथ विकल्प का चयन करना हमेशा अच्छा रहता है।
पिछले दो सालों में सिस्टमेटिक इन्वेस्टमेंट प्लान (सिप) के जरिए म्यूचुअल फंड के कई सारे यूनिट खरीदे हैं। अगर मैं इन्हें बेचता हूं तो कैपिटल गेन टैक्स (शॉर्ट टर्म या लांग टर्म) किस प्रकार लगाया जाएगा? – रोहित, भोपाल
टैक्स के नजरिये से सिप की प्रत्येक किस्त को अलग समझा जाएगा। अगर आप इक्विटी म्यूचुअल फंड के यूनिटों को अभी बेचते हैं जिसमें आपका निवेश एक साल से अधिक का है तो उससे हुए लाभ को लांग टर्म कैपिटल गेन की श्रेणी में रखा जाएगा और इसलिए उस पर टैक्स नहीं लगेगा। हालांकि, पिछले 11 महीने के दौरान अगर सिप पर कोई लाभ हुआ है तो उस पर 15 प्रतिशत की दर से टैक्स लगाया जाएगा।
अगर आपने डेट योजनाओं या बैलेंस्ड फंडों में निवेश किया है, जिसके तहत इक्विटी में 65 प्रतिशत से कम का निवेश किया जाता है तो इस पर अलग तरीके से टैक्स लगेगा।
ऐसी याजनाओं में एक साल से अधिक अवधि के सिप पर 10 प्रतिशत (या इंडेक्सेशन के साथ 20 फीसदी) के हिसाब से कर लगाया जाएगा। साथ ही अगर अल्पावधि का कोई लाभ होता है तो वह आपकी सालाना में जुड़ जाएगा और आप जिस कर-वर्ग में आते उस हिसाब से टैक्स लगेगा।
मैं सेवानिवृत्त हूं और मुझे पेंशन मिलता है। मैं एक किराए के घर में रहता हूं जिसका किराया 4,000 रुपये प्रति माह है। क्या कोई सेवानिवृत्त व्यक्ति किराए पर कर कटौती का दावा कर सकता है?
– राधा रमण सिंह, रायपुर
जी, आयकर अधिनियम की धारा ८0जीजी के तहत एक पेंशनभोगी व्यक्ति घर के किराए के एवज में अधिकतम 2,500 रुपये की कटौती प्राप्त कर सकता है, लेकिन इसकी कुछ शर्तें हैं।
पहला, धारा 4 के तहत वेतन में पेंशन भी शामिल होता है, दूसरा एसेसी जिस घर में रहता है उसके लिए किराया देता है और एसेसी, उसकी पत्नी-पति या उसके अवयस्क बच्चे के नाम कोई घर नहीं है। इसके अलावा उसे फॉर्म 10बीए भर कर नियोक्ता (जिसमें पिछला नियोक्ता भी शामिल है) को देना होता है।
मैंने साल 2009 में एजुकेशन लोन लिया था और अपने वेतन और से इसे मैंने दो साल के भीतर ही चुका दिया। वित्त वर्ष के मध्य में मेरा वेतन बढऩे वाला है और फिर मेरे वेतन पर टैक्स लगने लगेगा। क्या मैं एजुकेशन लोन पर अब टैक्स में छूट प्राप्त कर सकता हूं?             – प्रणव, दिल्ली
आप आयकर अधिनियम की धारा 80ई के तहत वित्त वर्ष के दौरान एजुकेशन लोन के केवल ब्याज के भुगतान पर कटौती का दावा कर सकते हैं। यह कटौती अधिकतम आठ वर्षों के लिए या जब तक आप ब्याज का भुगतान करते हैं, जो भी जल्दी हो, तब तक के लिए उपलब्ध होती है।
कटौती के दावे के लिए बैंक से ब्याज का सर्टिफिकेट लें। इस सर्टिफिकेट को अपने नियोक्ता के पास जमा करवाएं ताकि स्रोत पर कर कटौती (टीडीएस) समायोजित हो सके या फिर इसका इस्तेमाल इनकम टैक्स रिटर्न भरते समय करें।
मेरे पास एक फैमिली फ्लोटर प्लान है जिसके तहत मेरी मां भी कवर्ड हैं। मेरी मां की उम्र 56 साल है। मैं जानना चाहता हूं के जब किसी वरिष्ठ नागरिक को कवर में शामिल किया जाता है तो कंपनियां किस प्रकार प्रीमियम में इजाफा करती हैं? बीमा कंपनियां प्रीमियम में बढ़ोतरी कब कर सकती हैं? क्या फैमिली फ्लोटर प्लान के रिन्युअल की कोई अधिकतम उम्र-सीमा होती है? – कबिलाश, रायपुरज्यादातरबीमा कंपनियां अपने पोर्टफोलियो की समीक्षा करने के बाद प्रीमियम की दरों में इजाफा करती हैं। कुछ कंपनियां ऐसा प्रत्येक वर्ष करती हैं तो कुछ एक निश्चित समय-सीमा के बाद। यह कंपनी के स्तर पर होता है और इसका आपके प्लान से कोई संबंध नहीं होता है। कुछ पॉलिसियों में यह शर्त होती है कि प्रीमियम साल के दौरान किए गए क्लेम के आधार पर बढ़ाई जाती है।
प्रत्येक कंपनी के रिन्युअल की अधिकतम उम्र अलग-अलग होती है लेकिन कई कंपनियां आजीवन रिन्यू करती हैं। अच्छा रहेगा कि आप अपने वर्तमान पॉलिसी की समीक्षा करें और इस संदर्भ में जानें। बीमा नियामक के हालिया दिशानिर्देशों के अनुसार, अनुमान है कि पॉलिसी रिन्युअल की उम्र-सीमा समाप्त कर दी जाएगी।
मेरी उम्र 39 साल है और मेरी कमाई प्रति माह 30,000 रुपये है। मैं नौकरी छोड़ कर खुद का कारोबार शुरू करना चाहता हूं। मैंने शेयर और म्यूचुअल फंड दोनों में निवेश किया हुआ है। मुझे आधा ही फंड जुटाना होगा क्योंकि आधी पूंजी एक निवेशक लगा रहा है। क्या मुझे अपने वर्तमान निवेश से पैसों की व्यवस्था करनी चाहिए या फिर लोन लेना चाहिए?  – अभिषेक, लुधियाना
अभिषेक जी, कारोबार की शुरुआत के लिए लोन लेना कठिन होता है। आपके पास आधी पूंजी निवेशक के जरिए आ रही है इसलिए आप इस उद्यम में अपने निवेश से पैसे निकाल कर लगा सकते हैं।
हालांकि, आपको अपने निवेश से इस तरह निकलना चाहिए कि आपको जोखिम भी कम उठाना पड़े और रिटर्न भी अधिकतम मिले।
वैसे निवेश से पहले निकल लें जिस पर रिटर्न कम मिल रहा हो जैसे कि आपका बचत खाता जिस पर सिर्फ चार फीसदी सालाना का ब्याज मिलता है।
दूसरा विकल्प इक्विटी से निकलने का होना चाहिए क्योंकि इससे जोखिम कम होगा। म्यूचुअल फंडों से सबसे अंत में निकासी करें। इस उपाय से आप अपने पोर्टफोलियो से अधिकतम रिटर्न प्राप्त करते हुए निकल सकते हैं।
मैंने अपनी नौकरी साल 2012 में बदली थी। प्रक्रिया में विलंब की वजह से मुझे प्रोविडेंट फंड की बचत-राशि जून 2013 में मिली है। यह राशि तकरीबन 75,000 रुपये है। मैं इन पैसों का निवेश करना चाहता हूं। यह मेरा पहला निवेश होगा। मेरी उम्र 28 वर्ष है और मेरे ऊपर आर्थिक रूप से कोई निर्भर नहीं है न ही मेरे ऊपर किसी तरह का कर्ज है। मैं अपने पैसों का निवेश कहां करूं?  – तेज नारायण, भोपाल

प्रोविडेंट
फंड को आम तौर पर रिटायरमेंट के लिए किया जाने वाला बचत समझा जाता है। हालांकि, आपकी न कोई देनदारी है और न कोई आप पर आर्थिक रूप से निर्भर है, ऐसे में आप ज्यादा जोखिम वाले विकल्पों में भी निवेश कर सकते हैं।
इक्विटी डाइवर्सिफायड फंडों में सिस्टमेटिक इन्वेस्टमेंट प्लान (सिप) के जरिए निवेश करना सबसे अच्छा विकल्प रहेगा। आपको कुछ पैसों का निवेश डेट में फंड में रखते हुए आवधिक तौर पर उसका हिस्सा इक्विटी फंडों में ट्रांसफर करना चाहिए।
आप आईसीआईसीआई प्रूडेंशियल फोकस्ड ब्लू चिप या बिड़ला सन लाइफ फ्रंटलाइन इक्विटी फंडों पर विचार कर सकते हैं। इसके अलावा आपको दो मिड-कैप फंडों जैसे आईडीएफसी प्रीमियर इक्विटी, एसबीआई इमर्जिंग बिजनेस या आईसीआईसीआई प्रू डिस्कवरी फंडों पर भी विचार करना चाहिए।
मैं कुछ विशेष कमोडिटी में निवेश करना चाहता हूं जो ज्यादा प्रचलित नहीं है। इसके लिए सबसे अच्छा विकल्प क्या होगा? क्या इसके लिए मैं अपने डीमैट खाते का इस्तेमाल कर सकता हूं? मैं पहले से ही सिस्टमेटिक इंवेस्टमेंट प्लान के जरिए तीन म्यूचुअल फंडों, जिनमें फ्रैंकलिन टेंपलटन और एचडीएफसी के लार्ज-कैप भी शामिल हैं, में 2,000-2,000 रुपये का निवेश कर रहा हूं।
इसके मेरी पैतृक प्रॉपर्टी भी है। बीमा मैंने लिया हुआ है। क्या मेरे लिए कमोडिटी में निवेश करना ठीक रहेगा? मेरी उम्र 27 साल है और मेरी कमाई 40,000 रुपये प्रति माह है।
– अभिषेक, लुधियाना
कमोडिटी में निवेश के लिए विशेषज्ञता चाहिए होती है। फ्यूचर मार्केट में आपको ज्यादा राशि का निवेश करना होता है। साथ ही  आपको कमोडिटी चक्र की सही समझ होनी चाहिए। इसका एक विकल्प म्यूचुअल फंडों या एक्सचेंज ट्रेडेड फंडों में निवेश करना हो सकता है जो कमोडिटी में निवेश करते हैं जैसे गोल्ड ईटीएफ, एनर्जी या कृषि उत्पाद आदि। हालांकि, इनमें भी जोखिम कम नहीं होता है।
सबसे बेहतर विकल्प डाइवर्सिफायड म्यूचुअल फंडों का रहेगा जो मिड-कैप, स्मॉल-कैप, लार्ज-कैप और गोल्ड आदि में निवेश कर अच्छा रिटर्न अर्जित करते हैं। आपके निवेश पैटर्न और बैकग्राउंड को देखते हुए मेरी सलाह होगी कि आप अभी कमोडिटी में निवेश से दूर रहें।
इसके अलावा अभी कमोडिटी की कीमतों में उतार-चढ़ाव भी ज्यादा है। अगर आप कमोडिटी में निवेश के उत्सुक हैं तो आप अभी से कमोडिटी को ट्रैक करना शुरू कर दीजिए और जब आप इसे अच्छी तरह समझने लगें यानी आत्मविश्वास और विशेषज्ञता हासिल कर लें तो निवेश की शुरुआत कर सकते हैं। शुरुआत में आप कृषि उत्पादों में निवेश करने पर विचार कर सकते हैं।
मैं पर्सनल एक्सीडेंट कवर खरीदना चाहता हूं। मेरे पास एक टर्म प्लान है जिसमें एक्सीडेंटल डेथ का राइडर है। मुझे जानकारी है कि क्रेडिट कार्ड कंपनियां भी यह पॉलिसी अपने ग्राहकों को उपलब्ध कराती हैं। क्या यह सब प्लान अलग-अलग होते हैं? मुझे किस पॉलिसी का चयन करना चाहिए?
– रघुवीर, इंदौर
आप किसी साधारण बीमा कंपनी से पर्सनल एक्सीडेंट कवर एक अलग पॉलिसी के तौर पर ले सकते हैं। इसके अलावा जीवन बीमा कंपनियां इसे राइडर के रूप में पेश करती हैं और इसका लाभ कुछ क्रेडिट कार्ड कंपनियां भी देती हैं। लेकिन गौर करने वाली बात यह है कि प्रत्येक विकल्प के तहत पेश किए जाने वाले कवर की प्रकृति भिन्न होती है।
साधारण बीमा कंपनी और हेल्थ इंश्योरेंस कंपनियों का एक स्टैड एलोन कवर डेथ बेनीफिट के अलावा अतिरिक्त लाभ भी देता है जैसे स्थाई पूर्ण या आंशिक अपंगता, मेडिकल खर्च आदि। आप कवर की राशि भी चुन सकते हैं।
जीवन बीमा कंपनियों द्वारा पेश किए जाने वाले राइडर आम तौर पर केवल डेथ कवर के साथ कुछ मामलों में स्थाई पूर्ण अपंगता के मामले में अतिरिक्त कवर देते हैं।
हालांकि, इस कवर का आधार जीवन बीमा का प्लान होता है। क्रेडिट कार्ड के साथ मिलने वाला कवर वास्तव में ग्रुप इंश्योरेंस प्लान होता है और यह उस कंपनी विशेष के सभी कार्डधारकों के लिए होता है। यह तभी तक उपलब्ध रहता है जब तक आपका कार्ड एक्टिव रहता है।
मेरी उम्र 30 साल है और मुझे हाल ही में नौकरी मिली है। नौकरी दुबई में मिली है। मैं दुबई जाने से पहले एक जीवन बीमा पॉलिसी लेना चाहता हूं। कृपया सलाह दें कि मुझे जीवन बीमा पॉलिसी भारतीय कंपनी से लेनी चाहिए या फिर दुबई जाकर वहां की कंपनी से कवर लेना चाहिए? क्या जीवन बीमा पॉलिसियां सभी देशों में मान्य होती हैं?
– आमिर, दिल्ली
– आमिर जी, अगर आप  स्थाई तौर पर दुबई शिफ्ट नहीं हो रहे हैं तो आपके लिए भारत में टर्म इंश्योरेंस कवर लेना ज्यादा अच्छा रहेगा। इसके कई लाभ आपको मिलेंगे। भारतीय जीवन बीमा कंपनियों की प्रीमियम दरें प्रतिस्पर्धी हैं और यह तब भी जारी रहेगा जब आप बाद में दूसरे देश जाते हैं। इसके अलावा आपको भारत में टैक्स रिटर्न भरने पर प्रीमियम भुगतान पर आयकर का लाभ भी मिलेगा।
आप विदेश जा रहे हैं इसलिए अच्छा रहेगा कि आप प्रीमियम भुगतान के लिए इलेक्ट्रॉनिक क्लियरिंग सर्विस का चयन करें ताकि समय पर स्वत: ही आपकी पॉलिसी रिन्यू होती रहे। भारतीय पॉलिसियां विदेशों में भी मान्य है और अगर किसी कारणवश पॉलिसीधारक की मृत्यु विदेश में होती है तो नॉमिनी को सम एश्योर्ड का भुगतान बीमा कंपनियों द्वारा कर दिया जाता है।
मैं भारी मात्रा में इनकम टैक्स चुका रहा हूं और अभी तक मैंने कर-बचत के किसी भी विकल्प में निवेश नहीं किया है। शुरुआती निवेश होने के नाते मुझे कर-बचत के किन विकल्पों पर विचार करना चाहिए?
– अनंत कुमार, रायपुर
– अनंत जी, सबसे पहले तो मैं आपको बताना चाहूंगा कि कर-बचत की शुरुआत आपको वित्त वर्ष की शुरुआत के साथ ही आरंभ कर देनी चाहिए ताकि फरवरी-मार्च के महीने में अफरा-तफरी में अनुचित निर्णय लेने से बच सकें।
इस नजरिए से देखें तो अभी से कर-बचत की शुरुआत करना आपके लिए अच्छा रहेगा। सबसे पहले तो आप उन विकल्पों की सूची बनाइए जिनमें आप पहले ही निवेश कर चुके हैं। अगर आपके पास टर्म इंश्योरेंस पॉलिसी या कोई जीवन बीमा पॉलिसी है तो इसके प्रीमियम भुगतान पर भी आप धारा 80सी के तहत आयकर में छूट पा सकते हैं।
पब्लिक प्रोविडेंट एकाउंट भी आयकर में बचत और अच्छा रिटर्न पाने का एक अच्छा विकल्प है। आप इसमें सालाना एक लाख रुपये तक का निवेश कर सकते हैं। यह भी धारा 80सी के तहत आता है जिसकी सीमा विभिन्न विकल्पों को मिला कर एक लाख रुपये है। इसके अलावा आप मेडिक्लेम पॉलिसी के प्रीमियम भुगतान पर भी सालाना 15,000 रुपये की बचत कर सकते हैं।
मेरी उम्र 55 वर्ष है और मैं एक स्व-रोजगारी हूं। मेरे फर्म में कुछ मजदूर और कुछ कर्मचारी भी हैं। क्या मैं अपने इन कर्मचारियों, मजदूरों और अपने परिवार के लिए ग्रुप हेल्थ इंश्योरेंस ले सकता हूं?
– रघुवीर सिंह, अंबाला
– ग्रुप हेल्थ इंश्योरेंस खरीदने के लिए आपको दो जरूरतों को पूरा करना होगा। सबसे पहले तो आपको कम से कम 10 लोगों को इसके तहत कवर करना होगा। दूसरा, जिनके लिए आप यह कवर ले रहे हैं वह या तो आपके कर्मचारी हों या फिर उनके परिवार के सदस्य। आम तौर पर ग्रुप जितना ज्यादा बड़ा होता है, प्रति व्यक्ति प्रीमियम भी उतना ही कम होता है।
अगर आपकी मंशा स्वयं और आपने परिवार के सदस्यों के लिए ग्रुप इंश्योरेंस लेना है तो यह संभव नहीं होगा। अगर आप 10 या इससे अधिक व्यक्ति के समूह के लिए ग्रुप हेल्थ इंश्योरेंस लेने जा रहे हैं तो यह सुनिश्चित कर लें कि आपको पहले से मौजूद बीमारियों की प्रतीक्षा-अवधि में छूट की सुविधा मिल रही है। साथ ही बीमारी के हिसाब से इलाज के खर्च की सीमा या रूम रेंट की कोई सब-लिमिट नहीं है।
साल 2006 में मैंने पब्लिक प्रोविडेंट फंड (पीपीएफ) खाता खुलवाया था और इसमें नियमित रूप से पैसे जमा करवा रहा हूं। अब मैं अपने अवयस्क बच्चे के नाम से पीपीएफ खाता खुलवाना चाहता हूं। मुझे और मेरे बेटे की कर देनदारी के बारे में बताएं। – आनंद, इंदौर
-आप अपने अवयस्क बच्चे, जिसके अभिभावक आप होंगे, के नाम पर एक अतिरिक्त पीपीएफ खाता खुलवा सकते हैं।
यह सुनिश्चित कर लीजिए कि आपके और आपके अवयस्क पुत्र के पीपीएफ खाते में कुल मिला कर एक वर्ष एक लाख रुपये की सीमा पार नहीं कर रहा है। आयकर अधिनियम की धारा 80सी की सीमा एक लाख रुपये की है। अपने बेटे के पीपीएफ खाते में आप जो पैसे जमा करवाएंगे उसे उपहार समझा जाएगा और उस पर धारा 64 का क्लबिंग प्रावधान लागू होना चाहिए।
ध्यान रखें कि अवयस्क बच्चे का पीपीएफ खाता मैच्योर होने से प्राप्त होने वाली राशि का निवेश अगर ऐसे विकल्प में किया जाता है जहां कर लगता है तो उस विकल्प से होने वाली आय माता या पिता जिसकी भी आय अधिक होगी, उनकी आय में जुड़ जाएगी। हालांकि, अगर पीपीएफ मैच्योर होने के समय तक बच्चा वयस्क हो जाता है तो प्राप्त होने वाली राशि बच्चे की परिसंपत्ति होगी और यह माता-पिता की आय में नहीं जुड़ेगा।
क्या जीवन बीमा पॉलिसियों की खरीदारी की कोई सीमा तय है? जैसे कोई व्यक्ति अधिकतम एक निश्चित संख्या में ही पॉलिसी खरीद सकता हो?    – रामचंद्र श्रीवास्तव, जोधपुर
– आप जितनी जीवन बीमा पॉलिसी चाहें खरीद सकते हैं। इसकी कोई संख्यात्मक सीमा नहीं है। इन दिनों बीमा कंपनियों जीवन बीमा प्रस्तावक का इनकम प्रूफ मांगते हैं। इसके अलावा कंपनियां यह भी देखती हैं कि प्रस्तावक के पास वर्तमान में कितनी पॉलिसियां हैं और क्या उसकी आर्थिक स्थिति ऐसी है कि वह नियमित रूप से प्रीमियम भर सकता है? बीमा कंपनियां तभी पॉलिसी जारी करती हैं जब वह यह सुनिश्चित कर लेती हैं कि पॉलिसीधारक नियमित रुप से इसके प्रीमियम का भुगतान करने में सक्षम है।
लेकिन एक बार बीमित हो जाने के बाद सभी जीवन बीमा पॉलिसियां पॉलिसीधारक की मृत्यु के बाद सम एश्योर्ड का भुगतान करेंगी। इसके अलावा अगर पॉलिसीधारक जीवित रहता है तो विभिन्न पॉलिसियों के नियम एवं शर्तों के अनुरूप उसे मैच्योरिटी का लाभ भी मिलेगा। लेकिन किसी भी व्यक्ति के लिए दो या तीन से अधिक पॉलिसी लेने की सलाह नहीं दी जाती है।
मेरी उम्र 28 वर्ष है और मैं कर्ज-जाल में फंस चुकी हूं। इसकी शुरुआत सेल सीजन से हुई जब डिस्काउंट इतने आकर्षक थे कि खुद को खरीदारी से रोक पाना मुश्किल हो रहा था। जब मेरे क्रेडिट कार्ड का बिल आया तो मैंने दो कार्ड की न्यूनतम राशि तो भर दी लेकिन तीसरे कार्ड का बिल न दे पाई। बकाया राशि अब काफी बढ़ गई है। मैंने म्यूचुअल फंडों के जरिए थोड़ी बचत की है। कर्ज की इस स्थिति से निपटने के लिए मुझे क्या करना चाहिए?
– राधिका, चंडीगढ़
इस समय आपका प्राथमिक लक्ष्य क्रेडिट कार्ड के कर्ज-जाल से बाहर आने का होना चाहिए। क्रेडिट कार्ड के बकाए राशि पर जो ब्याज लगता है वह 36 से 48 प्रतिशत तक होता है।
आपको चाहिए कि उच्च लागत वाली कर्ज चुकाने के लिए फिलहाल आप कम लागत वाली कर्ज लें जिसका प्रबंधन आप ज्यादा आसानी से कर सकती हैं। क्रेडिट कार्ड का कर्ज चुकाने के लिए आप पर्सनल लोन ले सकती हैं या अपनी कंपनी, मित्र या संबंधियों से उधार ले सकती हैं। आप अपने क्रेडिट कार्ड जारी करने वाले बैंक से बात करें और उनसे कहें कि वह बकाए राशि को मासिक किस्तों में बदल दें।
आप घर, सोना आदि जैसी परिसंपत्तियों के बदले तीन साल का लोन लेकर भी क्रेडिट कार्ड के कर्ज का भुगतान कर सकती हैं। इससे आपको एक शिक्षा यह भी मिलेगी कि क्रेडिट कार्ड के महंगे कर्ज जाल में नहीं फंसना चाहिए।
दूसरा विकल्प यह है कि आप अपने निवेश से पैसे निकाल कर इस कर्ज का भुगतान करें।
क्योंकि इस पर मिलने वाला रिटर्न क्रेडिट कार्ड की ब्याज दरों से शायद ही अधिक हो। हालांकि, यह निर्णय अच्छा नहीं लगेगा लेकिन आर्थिक नजरिये यह सही फैसला होगा। जब आपकी वित्तीय स्थिति सुधरती है तो आप फिर से म्यूचुअल फंडों में निवेश कर सकती हैं।
क्रेडिट कार्ड के लोन की रीस्ट्रक्चरिंग करते समय आपको क्रेडिट कार्ड का इस्तेमाल नहीं करना चाहिए। इससे बकाया राशि बढ़ती चली जाएगी और ब्याज की गणना इसके आधार पर की जाएगी। आपको यह भी समझना चाहिए कि आपके क्रेडिट कार्ड की हिस्ट्री से आपका क्रेडिट स्कोर भी प्रभावित होगा। इससे भविष्य में आपको लोन ले
फाइनेंशियल एडवाइजर्स नियमित तौर पर लंबी अवधि के निवेश के लिए इक्विटी फंड के बजाय, इक्विटी लिंक्ड सेविंग स्कीम (ईएलएसएस) में निवेश करने की सलाह देते हैं। हालांकि फंड के नतीजे दिखाते हैं कि डाइवर्सिफाइड इक्विटी फंड का प्रदर्शन व्यक्तिगत तौर पर ईएलएसएस स्कीम की तुलना में बेहतर है। श्रेणी के तौर पर भी इनका प्रदर्शन अच्छा है और लिक्विडिटी के रूप में अतिरिक्त फायदा मिलता है। कृपया स्पष्ट करें, क्योंकि मैं प्रतिमाह एक हजार रुपये का निवेश सिस्टमेटिक इंवेस्टमेंट प्लान (सिप) में करना चाहता हूं।
– राजेश, जयपुर
– फंड के प्रदर्शन में यह अंतर आमतौर पर प्रबंधन के अलग-अलग तरीकों की वजह से आता है। हो सकता है कि किसी एक वक्त में प्रबंधन के किसी स्टाइल से बाजार में अच्छा रिटर्न कमाया जा सके। ईएलएसएस स्कीम आम तौर पर स्मॉल और मिड कैप शेयरों में ज्यादा निवेश करती हैं। इन सेक्टर में अच्छा मुनाफा कमाने के लिए फंड मैनेजर आम तौर पर तीन साल के पूरे लॉक-इन पीरियड का फायदा उठाते हैं।
डाइवर्सिफाइड इक्विटी फंड ज्यादातर लार्ज कैप में निवेश करते हैं। कहने का मतलब यह है कि उस वक्त जब ग्रोथ और लार्ज कैप हावी हो तो निश्चित तौर पर डाइवर्सिफाइड इक्विटी फंड का प्रदर्शन ईएलएसएस स्कीम से बेहतर रहेगा। तो अगर आपका लक्ष्य है कि आप लंबे समय तक निवेश करके रखें और टैक्स की बचत भी कर पाएं तो ईएलएसएस स्कीम एक बेहतर विकल्प हो सकती है।ने में दिक्कत हो सकती है। इसलिए, अभी से यह ठान कर चलें कि भविष्य में आप ऐसी परिस्थिति में न फंसे।
मैंने साल 2009 में एक फ्लैट बुक करवाया था। मैंने अभी तक इस फ्लैट का पजेशन नहीं लिया है क्योंकि यह अब भी तैयार हो रहा है। अगर मैं अभी इस फ्लैट को बेचूं और इससे प्राप्त पैसों से दूसरा फ्लैट खरीदूं तो क्या फ्लैट की बिक्री पर मुझे कैपिटल गेन टैक्स देना होगा? कृपया निम्नलिखित दो परिस्थितियों में कर देनदारी के बारे में बताएं:
1. अगर मैं पजेशन से पहले फ्लैट बेच दूं,2. अगर मैं पजेशन लेने के बाद लेकिन पजेशन लेने के तीन साल बाद फ्लैट बेचूं।-करीम, गाजियाबाद
– अगर आप फ्लैट तैयार होने से पहले ही बेचते हैं तो आप यह कह सकते हैं कि वास्तव में आप उस फ्लैट का अधिकार बेच रहे हैं (न कि फ्लैट क्योंकि वह अभी तैयार ही नहीं हुआ) जिसे आपने साल 2009 में प्राप्त किया। और चूंकि यह अधिकार आपने तीन साल तक बनाए रखा इसलिए इसे बेचने से प्राप्त होने वाली राशि लांग टर्म कैपिटल गेन की श्रेणी में आएगी।
इस अधिकार को बेचने से प्राप्त राशि का पुनर्निवेश अगर आप किसी दूसरी रेजीडेंशियल प्रॉपर्टी में करते हैं तो आप धारा 54एफ के तहत कर में छूट का लाभ ले सकते हैं, लेकिन इसके लिए इस धारा की शर्तों को पूरी करना होगा।
अगर आप इस फ्लैट का पजेशन लेने के बाद लेकिन पजेशन लेने के तीन साल से पहले इसे बेच देते हैं तो इसे बेचने से प्राप्त होने वाले पैसे शॉर्ट टर्म कैपिटल गेन की श्रेणी में आएंगे और इसके पुनर्निवेश पर आपको किसी तरह की छूट नहीं मिलेगी। हालांकि, पहले वाला विकल्प ज्यादा अच्छा है।
ैं सिस्टमेटिक इंवेस्टमेंट प्लान के जरिए म्यूचुअल फंडों में एक साल के लिए निवेश करना चाहता हूं। कृपया कुछ अच्छे म्यूचुअल फंडों के बारे में जानकारी दें जिनमें मैं निवेश की शुरुआत करूं।
– अमन, लुधियाना
अमन जी, जब कभी निवेश करने चलें तो एक लक्ष्य निश्चित कर लीजिए इससे आपको अपने उद्देश्यों के लिए उचित राशि का निर्धारण करने में मदद मिलेगी। एक साल की अवधि कोई अधिक नहीं है इसलिए बेहतर रहेगा कि आप रैकरिंग डिपॉजिट का सहारा लें। अगर आप तीन साल से अधिक अवधि के लिए निवेश करना चाहते हैं तो बैलेंस्ड म्यूचुअल फंडों का चयन कर सकते हैं।
बैलेंस्ड फंड इक्विटी में 65 फीसदी का निवेश करते  हैं और शेष का डेट में। यही वजह है कि बैलेंस्ड फंडों के प्रदर्शन में ज्यादा अस्थिरता नहीं देखी जाती। आप एचडीएफसी बैलेंस फंड और रिलायंस रेगुलर सेविंग बैलेंस्ड फंडों में सिप के जरिए निवेश करने पर विचार कर सकते हैं। इन दोनों फंडों का ट्रैक रिकॉर्ड अच्छा है साथ प्रदर्शन का इतिहास भी बढिय़ा है।
मेरी पत्नी अपने नाम पर फिक्स्ड डिपॉजिट कराना चाहती है। वह अपने बच्चों के नाम पर भी कुछ पैसों का एफडी करवाना चाहती है। क्या इसके लिए मैं उसे फंड उपलब्ध करा सकता हूं?
– कवींद्र, रायपुर
अगर आप अपनी पत्नी या अवयस्क बच्चों के नाम पर फिक्स्ड डिपॉजिट करवाते हैं तो उससे प्राप्त होने वाले ब्याज आपकी आय में जुड़ जाएगा क्योंकि आपके इस उपहार पर क्लबिंग के प्रावधान लागू होंगे। यद्यपि, भारत में कोई गिफ्ट टैक्स नहीं है लेकिन धारा 64 के तहत आने वाला क्लबिंग का प्रावधान लागू होता है।
इस परिस्थिति से निपटने के लिए आपके पास सीमित संसाधन हैं। अगर कोई बच्चा सालाना 1,500 रुपये अर्जित करता है तो इस राशि पर छूट मिलती है लेकिन यह केवल दो बच्चों तक ही लागू होता है।
इससे अधिक की आय को अपने इनकम टैक्स रिटर्न में आपको तब तक दिखाना होगा जब तक कि बच्चा 18 साल का नहीं हो जाता। अगर आपको 10 फीसदी का रिटर्न मिलता है तो आप प्रत्येक बच्चे के नाम 15,000 रुपये का निवेश कर कर-मुक्त ब्याज प्राप्त कर सकते हैं। आप अपनी पत्नी को उनकी कुछ सेवाओं के लिए प्रोफेशनल फीस दे सकते हैं।
इन पैसों पर जो ब्याज मिलेगा उसे आपकी आय में शामिल नहीं किया जाएगा। लेकिन इसके लिए वास्तविक ट्रांजैक्शन होना चाहिए नहीं तो इनकम टैक्स के अधिकारी सवाल उठा सकते हैं। कोई व्यक्ति चाहे तो अपने वयस्क बच्चे के नाम भी फंड ट्रांसफर कर सकता है, ऐसे मामले में तब क्लबिंग का प्रावधान लागू नहीं होता जब आप उपहार को प्रदर्शित करते हैं।
मैंने चंडीगढ़ में दो साल पहले एक घर खरीदा था और इसका बीमा भी था। हाल में मैंने इसके नवीकरण में 10 लाख रुपये खर्च किए हैं। मैं जानना चाहता हूं कि क्या खर्च किए गए इस रकम के आधार पर घर के बीमा की रकम में बढ़ोतरी करवाई जा सकती है? अगर हां तो इसके लिए क्या करना होगा?
– बलदेव राज सचदेवा, चंडीगढ़
जब आप कोई पॉलिसी खरीदते हैं तो पॉलिसी शेड्यूल में जरूरी कवर और ग्राहक द्वारा चुने गए कवर का स्पष्ट उल्लेख होता है। पॉलिसी अवधि के दौरान अगर ग्राहक घर में कोई तब्दिली करता है या घर में कोई नई चीज लाता है तो उसे बीमा कंपनी से संपर्क कर इन नई चीजों को मौजूदा कवर में शामिल करवाना चाहिए।
अगर घर के रेनोवेशन में 10 लाख रुपये लगे हैं तो बीमा कंपनी आपसे पूछेगी कि आपने घर में क्या- क्या नई चीजें लगवाई हैं और उनकी कीमत क्या है? इसके आधार पर प्रीमियम की रकम में संशोधन किया जाएगा और नई चीजों को बीमा में शामिल किया जाएगा।
अगर आपने इलेक्ट्रॉनिक सामान जैसे टेलीविजन आदि खरीदा है तो आप इसकी कीमत के बारे में बीमा कंपनी को बताएं। इसके आधार पर बीमा कंपनी अतिरिक्त प्रीमियम की गणना करेगी जिसका भुगतान आपको पॉलिसी की शेष अवधि के लिए करना होगा।
पिछले तीन महीने से मेरे तलाक की प्रक्रिया चल रही है और इसकी अंतिम तारीख तीन महीने बाद है। अंतिम तारीख को मुझे एकमुश्त 12 लाख रुपये मिलेंगे और अगले पांच साल तक सालाना एक लाख रुपये मिलेंगे। मेरी एक बेटी है जो स्कूल जाती है और वह मेरे साथ ही रहेगी। क्या मुझे मिलने वाला गुजारा- भत्ता टैक्सेबल होगा? भविष्य के इस्तेमाल के लिए मैं इन पैसों का निवेश कहां करूं?
– कविता, दिल्ली
– सभी प्रभावित लोगों के मन में यह प्रश्न उठता है कि तलाक के अंतिम चरण में जब तलाक लेने वाले को हिंदु मैरेज एक्ट 1995 की धारा 25 के तहत विवाह के टूटने पर जब गुजारा- भत्ता मिलता है तो क्या यह तलाकशुदा की आय होगी  और क्या इस पर टैक्स देना होगा? इस मसले के कानूनी मामलों की तह में जाने की जगह, यह कहा जा सकता है कि कोई भी एकमुश्त राशि जो तलाक के बाद अदालत के आदेश के बाद तलाकशुदा के हाथों में आता है उसे तलाकशुदा को प्राप्त हुई पूंजी समझा जाता है और इसलिए उस पर टैक्स नहीं लगता है। मासिक प्राप्त होने वाली राशि कमाई समझी जाती है और इसलिए यह टैक्सेबल होता है।
इसका आधार प्रतापगढ़ की प्रिंसेस माहेश्वरी देवी बनाम कमिश्नर ऑफ इनकम टैक्स 147 आईटीआर 258 (बांबे) के मामले में बांबे उच्च न्यायालय का एक फैसला है। इसलिए आपके मामले में, 12 लाख रुपया कर- मुक्त होगा जबकि पांच साल तक मिलने वाली सालाना एक लाख रुपये की राशि विवादास्पद है। लेकिन मेरे ख्याल से यह राशि भी कर- मुक्त होगी। ध्यान रखने लायक महत्वपूर्ण बात यह है कि अगर इसका आदेश अदालत देती है तो रेवेन्यू अथॉरिटी कोई प्रश्न नहीं उठा सकता।
अगर इसका सेटलमेंट कोर्ट के बाहर होता है तो एकमुश्त भुगतान की टैक्सेबिलिटी पर रेवेन्यू अथॉरिटी प्रश्न कर सकता है। इसलिए बेहतर रहेगा कि सेटलमेंट पर कोर्ट की मुहर लगवा ली जाए। सेटलमेंट के तौर पर आपसी सहमति के बाद जो राशि तय की जाती है, उसे वास्तविक तलाक मिलने से पहले प्राप्त करना ज्यादा बेहतर रहेगा। क्योंकि धारा 56(2) के अनुसार, पति से पत्नी को मिलने वाली राशि पत्नी के हाथों में कर- मुक्त होती है।
लेकिन तलाक हो जाने के बाद पूर्व- पति से मिलने वाली 50,000 रुपये अधिक की राशि धारा 56(2) के तहत टैक्सेबल हो जाता है। इसलिए, टैक्सेशन के मामले में फंसने से बचने के लिए अच्छा रहेगा कि सेटलमेंट के पैसे आप वास्तविक तलाक से पहले प्राप्त कर लें। गौर करने वाली महत्वपूर्ण बात यह भी है कि आप सेटलमेंट के पैसे चेक या बैंकिंग चैनल से प्राप्त करें।
आयकर बचाने का सबसे अच्छा विकल्प क्या है जिसमें मुझे दीर्घावधि में सबसे अधिक रिटर्न भी मिले और टैक्स भी बचे? – रत्नाकर, भोपाल
निवेश का सबसे अच्छा विकल्प, जहां आप आयकर में भी बचत कर सकते हैं और अच्छा रिटर्न भी प्राप्त कर सकते हैं, इक्विटी लिंक्ड सेविंग स्कीम (ईएलएसएसdiv style=”text-align: justify;”) है जिसे म्यूचुअल फंड कंपनियां पेश करती हैं। ईएलएसएस में किए गए निवेश पर धारा 80सी के तहत एक लाख रुपये तक की कटौती का लाभ मिलता है।
अधिकतर ईएलएसएस अपने पोर्टफोलियो के 90 प्रतिशत से अधिक का निवेश इक्विटी में करते हैं और शेष राशि का निवेश डेट में करते हैं। इनकी लॉक- इन अवधि तीन वर्षों की होती है जो कर- बचत के अन्य विकल्प जैसे पीपीएफ और टैक्स सेविंग फिक्स्ड डिपॉजिट की तुलना में काफी कम है।
वास्तव में आरजीईएसएस के अलावा यह एकमात्र मार्केट लिंक्ड निवेश का विकल्प है। जीवन बीमा कंपनियों के यूनिट लिंक्ड इंश्योरेंस प्लान (यूलिप) की लॉक इन अवधि पांच वर्षों की होती है और नेशनल पेंशन सिस्टम के टियर- 1 खाते से आप रिटायरमेंट से पहले निकासी नहीं कर सकते।
आप दीर्घावधि के लिए ईएलएसएस में निवेश करने पर विचार कर सकते हैं। हालांकि, इसकी लॉक इन अवधि तीन वर्षों की है लेकिन यह जरूरी नहीं है कि निवेशक तीन साल पूरे होते ही पैसे निकाल ले।
याद रखिए कि ईएलएसएस से आपको जो रिटर्न मिलता है वह निश्चित नहीं होता और यह इस बात पर निर्भर करता है कि आप कब और कैसे इसमें निवेश कर रहे हैं। निवेश के लिए आपको एक या दो अच्छे ईएलएसएस का चयन करना चाहिए। आप फ्रैंकलिन इंडिया टैक्स शील्ड, एचडीएफसी टैक्स सेवर, आईसीआईसीआई प्रूडेंशियल टैक्स प्लान और एल एंड टी टैक्स एडवांटेज पर विचार कर सकते हैं।
मेरे पिताजी को एक व्यक्ति ने कॉल किया जो खुद को बीमा नियामक एवं विकास प्राधिकरण (आईआरडीए) का अधिकारी बता रहा था। उसने मेरे पिताजी से उनकी पॉलिसियों के बारे विस्तृत जानकारी हासिल करने की कोशिश की। उसने कहा कि एलआईसी में निवेश पर उन्हें 1,50,000 रुपये का बोनस मिला है जिसका क्लेम अगर वह नहीं करते हैं तो यह राशि एजेंट को मिल जाएगी। उसने कहा कि आप यह पैसे बिना एजेंट को शामिल किए क्लेम कर सकते हैं। मेरे पिताजी ने उससे कहा कि वह एजेंट के जरिए इस पैसे का क्लेम करेंगे। कृपया बताएं कि हमें क्या करना चाहिए। क्या वह हमारे द्वारा दी गई सूचनाओं का गलत इस्तेमाल भी कर सकते है? – राहुल, दिल्ली
– राहुल जी, इन दिनों आईआरडीए के नाम पर कई लोगों को झूठे कॉल आ रहे हैं। ऐसा पाया गया है कि आईआरडीए के नाम पर झूठे कॉल कोई अनजान आदमी इस दावे के साथ करता है कि वह इंश्योरेंस पॉलिसी के पैसे वापस दिलवा देगा। आम तौर पर जिन लोगों ने पुराने यूलिप बिना सोचे-समझे निवेश किया, उनके लिए उससे पैसे निकालना टेढ़ी खीर बन चुका है। ऐसे कई उदाहरण सामने आए है कुछ लोग ऐसे कॉल के फेर में फंस कर और इन पर विश्वास कर अपने पैसे गंवा चुके हैं। बीमा नियामक ने एक नोटिस जारी कर स्पष्ट कर दिया कि आईआरडीए इस तरह के कोई कॉल नहीं कर रहा। आप भी इस बात को समझिए और ऐसे कॉल के झांसे में मत पडि़ए। दूसरे लोगों को भी इस बारे में जानकारी दें ताकि वह इस झूठे कॉल के चक्कर में न फंस सकें।
मैंने एक बैंक में होम लोन के लिए यह सोच कर आवेदन किया कि ब्याज दरें भी कम हैं और साथ ही पारदर्शिता भी है। मुझे 45 लाख रुपये का लोन आवंटित किया गया। लोन आवंटित होने तक मुझसे सैकड़ों दस्तावेजों पर हस्ताक्षर करवाए गए और मुझसे यह कहा गया कि लोन लेने के लिए यह सब औपचारिकताएं पूरी करनी होती हैं। हालांकि, लोन के आवंटित होने पर मैंने पाया कि मंजूर की गई राशि 49.25 लाख रुपये है। जब मैंने पूछताछ की तो जानकारी मिली कि 4.25 लाख रुपये का भुगतान बैंक ने मैक्स न्यू यॉर्क लाइफ इंश्योरेंस को बीमा पॉलिसी के प्रीमियम के तौर पर किया है जिसका सम एश्योर्ड 49 लाख रुपये और अवधि 25 साल है। यह पॉलिसी मेरे और मेरी पत्नी के लिए ली गई। इसके बारे में पहले मुझे कभी नहीं बताया गया और मैं यह घाटा नहीं उठा सकता। बैंक के अधिकारियों ने कहा कि अगर मैं लोन का प्री-पेमेंट करूंगा तो बीमा के पैसे मुझे वापस मिल जाएंगे। इस बैंक ने न केवल गलत तरीके से 4.25 लाख रुपये आवंटित किए बल्कि वह इन पैसों पर ब्याज भी वसूल रहा है। कृपया मुझे सलाह दें कि लोन की राशि को घटा कर 45 लाख रुपये कैसे किया जा सकता है? साथ ही यह भी बताएं कि बीमा वाले पैसों पर जो ब्याज वसूला जा रहा है उसे कैसे माफ कराया जाए?
– मनोज, गाजियाबाद
– बैंक द्वारा होम लोन आवंटित किए जाने के बाद आपको यह जानकारी मिलना कि आपके होम लोन का इंश्योरेंस भी किया जा चुका है, वास्तव में यह स्पष्ट करता है कि बैंक के परिचालन में स्पष्टता का अभाव है और वह ग्राहकों को कोई तवज्जो नहीं देता है। आश्चर्य की बात है कि बैंक आपको बिना बताए आपके होम लोन का इंश्योरेंस कैसे कर सकता है? बैंक को इसकी जानकारी पहले ही देनी चाहिए।
इसके लिए व्यक्तिगत स्तर पर बताया जाना चाहिए था कि आप होम लोन इंश्योरेंस लेना चाहते हैं या नहीं और आप इसका प्रीमियम देने में समर्थ हैं या नहीं। पचास लाख रुपये का एक सामान्य टर्म प्लान अगर 25 वर्षों की अवधि के लिए लिया जाए तो इसका प्रीमियम एक लाख से कम ही बैठेगा लेकिन 4.25 लाख रुपये के प्रीमियम वाली पॉलिसी एक मुद्दा है और किसी ने भी इसे एक ग्राहक के नजरिए से समझने की कोशिश नहीं की।
यह उन बैंक अधिकारियों की असंवेदनशीलता प्रदर्शित करता है जो लोन प्रक्रिया में शामिल थे। आप इस मामले को लेकर बैंकिंग लोकपाल के पास जा सकते हैं लेकिन आपको यह साबित करना होगा कि बैंक के अधिकारियों ने बिना आपकी जानकारी के यह पॉलिसी दिलवाई है क्योंकि आपने सभी दस्तावेजों पर अपने हस्ताक्षर पहले ही कर दिए थे।  
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Suresh Kumar Narula

SEBI Investment Advisor, Founder & Principal Financial Planner at Prudent Financial Planners
Suresh K Narula is founder and Principal Financial Planner at Prudent Financial Planners. He has earned the professional CERITIFIED FINANCIAL PLANNER and got registered with SEBI as Investment Advisor. He writes on personal and financial planning articles and got published in Dainik Bhaskar, Business Bhaskar and The Financial Planner's Guild, India. He is also a member of Financial Planner's Guild India ( An association of practicing SEBI registered Investment advisers) to create awareness about Financial Planning in general public, promote professional excellence and ensure high quality practice standards. Suresh received his an M.com from Himachal Pardesh University and an MFC from Punjab University, Chandigarh. He can be reached at info@prudentfp.in
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